उत्तराखंड में पलायन पर सबसे बड़ी रिपोर्ट - 1700 गांव खाली, SIR में खुला पहाड़ का सच

उत्तराखंड में चुनाव आते ही सबसे बड़ा मुद्दा बन जाता है - पलायन। इस बार तो चुनाव आयोग के SIR ने ही पलायन की पोल खोल दी है।
1700 गांव बने भूतिया गांव
पौड़ी गढ़वाल, टिहरी, अल्मोड़ा, चमोली, बागेश्वर - इन जिलों में जाओ तो कई गांवों में सिर्फ ताले लटके मिलेंगे। सरकारी रिपोर्ट कहती है पिछले 10 साल में 1700 से ज्यादा गांवों में आबादी 50% से भी कम रह गई है। कई गांवों में तो 5-10 परिवार ही बचे हैं। इन्हें ही भूतिया गांव कहा जा रहा है।
पलायन क्यों हो रहा है? असली कारण
1. रोजगार नहीं - पहाड़ में खेती से गुजारा नहीं होता, नौकरी के लिए देहरादून, हल्द्वानी जाना पड़ता है।
2. स्कूल बंद - कई गांवों के सरकारी स्कूलों में 10 से कम बच्चे हैं, सरकार ने 700 से ज्यादा स्कूल बंद कर दिए।
3. अस्पताल में डॉक्टर नहीं - पहाड़ी जिलों के अस्पतालों में 60% डॉक्टरों के पद खाली हैं।
SIR से कैसे निकला पलायन का सच?
अभी चुनाव आयोग घर-घर जाकर Special Intensive Revision (SIR) कर रहा है। BLO घर पहुंच रहे हैं तो घर बंद मिल रहे हैं। पूछने पर पता चलता है परिवार देहरादून शिफ्ट हो गया है।
आंकड़ा देखो - 2012 में देहरादून जिले में 12 लाख वोटर थे, आज 21 लाख हो गए हैं। हल्द्वानी में भी वोटर 40% बढ़ गए। ये 9 लाख बढ़े हुए वोटर कहां से आए? यही तो पहाड़ से पलायन करके आए लोग हैं। इसलिए अब कहा जा रहा है वोटर लिस्ट सिर्फ लिस्ट नहीं, पलायन का आईना है।
सरकार क्या कर रही है?
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार 3 योजनाओं की बात करती है।
1. होमस्टे योजना - अपने घर को होटल बनाओ, सरकार 10 लाख तक मदद देगी।
2. रिवर्स पलायन - कोरोना में जो लोग वापस आए, उन्हें वहीं रोजगार देना।
3. वेडिंग डेस्टिनेशन - पहाड़ में शादी कराओ, स्थानीय लोगों को काम मिलेगा।
पर जमीन पर अभी भी पलायन ही सच है। अल्मोड़ा के कई युवाओं ने बताया - होमस्टे में बुकिंग नहीं आती, सड़क ही नहीं है तो टूरिस्ट कैसे आएगा?
कुछ सवाल - जवाब
सवाल उत्तराखंड में सबसे ज्यादा पलायन कहाँ हुआ है?
जवाब पौड़ी गढ़वाल, फिर अल्मोड़ा और टिहरी में।
सवाल भूतिया गांव किसे कहते हैं?
जवाब जहाँ 50% से ज्यादा घर खाली हो गए हों।
सवाल SIR से पलायन का क्या पता चलेगा?
जवाब घर-घर जांच से पता चलेगा कितने लोग गाँव छोड़कर शहर चले गए।
सवाल रिवर्स पलायन क्या है?
जवाब शहर से वापस पहाड़ आकर वहीं रोजगार शुरू करना।








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